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नक्शे को खींचें या ज़ूम करें। किनारे उतरने के लिए किसी द्वीप पर टैप करें।
यहाँ अभी एक किताब छिपी है। अध्याय 3 से, पाठक मिलकर इसे प्रायोजित कर धुंध हटा सकेंगे।


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गर्बर कहते हैं कि छोटे व्यवसायों के ज़्यादातर संस्थापक असल में "उद्यमी" नहीं होते, बल्कि "उद्यमिता के दौरे से पीड़ित तकनीशियन" (technician suffering an entrepreneurial seizure) होते हैं। किसी हुनर में माहिर होने की वजह से उन्हें लगता है कि हुनर जानना ही कारोबार चलाना जानना है। वे कारोबार में कूद पड़ते हैं और फिर रोज़मर्रा के कामों में डूब जाते हैं।
किताब के अनुसार हर उद्यमी के भीतर तीन व्यक्तित्व एक साथ रहते हैं, जो एक-दूसरे को अलग दिशाओं में खींचते हैं:
ज़्यादातर छोटे व्यवसाय मालिक "10% उद्यमी, 20% प्रबंधक और 70% तकनीशियन" होते हैं। यही वजह है कि इतने छोटे व्यवसाय अटक जाते हैं: मालिक काम करने में व्यस्त है, पर व्यवसाय को कोई नहीं चला रहा।
गर्बर व्यवसाय के विकास को तीन चरणों में बाँटते हैं:
शैशव (Infancy): मालिक ही व्यवसाय है। सब कुछ वह खुद करता है, और व्यवसाय पूरी तरह एक व्यक्ति की ताक़त और हुनर पर टिका होता है।
बाहर कैसे निकलें: मान लें कि अकेले सब कुछ नहीं हो सकता। सोच जल्दी बदलें: जब व्यवसाय अभी छोटा है, तभी "मैं सबसे अच्छा करता हूँ" वाली तकनीशियन सोच से उसे चलाना बंद करें, और काम को सिर्फ़ लोगों को नहीं, बल्कि प्रणालियों को सौंपने का अभ्यास शुरू करें।
किशोरावस्था (Adolescence): काम इतना बढ़ जाता है कि मालिक अकेले नहीं संभाल पाता, और वह मदद के लिए लोग रखने लगता है।
किशोरावस्था का आम जाल है "पल्ला झाड़कर प्रबंधन" (Management by Abdication): बिना तरीका सिखाए और बिना मानक तय किए कर्मचारियों पर काम "फेंक" देना, बस "तुम संभाल लो" कह देना, और नतीजा ख़राब आने पर खुद कूदकर आग बुझाना। गर्बर इस नकली सौंपने को "पल्ला झाड़ना" कहते हैं, और यही किशोर अवस्था के व्यवसायों के बार-बार अटकने और मालिक के और ज़्यादा थक जाने की मुख्य वजह है।
बाहर कैसे निकलें: "सौंपकर प्रबंधन" (Management by Delegation)। काम फेंकना नहीं, बल्कि नतीजे, मानक और प्रक्रियाएँ साफ़-साफ़ तय करना, कर्मचारियों को उनके अनुसार काम करने का अधिकार देना, और नतीजों पर लगातार नज़र रखना।
परिपक्वता (Maturity): व्यवसाय के पास अब दोहराई जा सकने वाली और बढ़ाई जा सकने वाली प्रणालियाँ हैं, और वह सिर्फ़ संस्थापक के निजी हुनर पर निर्भर नहीं है।
McDonald's की कहानी: रे क्रॉक न रसोइये थे, न रेस्तराँ के काम से आए थे। वे कॉलेज नहीं गए और कई काम बदले: पेपर कप बेचने वाले सेल्समैन, संगीतकार, रेडियो होस्ट, रेस्तराँ कर्मचारी और मिल्कशेक मशीन के सेल्समैन। 1954 में, 52 साल की उम्र में, उन्होंने सुना कि कैलिफ़ोर्निया में एक बर्गर की दुकान उनकी बेची आठ मिल्कशेक मशीनें एक साथ चलाती है और एक बार में चालीस मिल्कशेक बना लेती है। जिज्ञासा में वे वहाँ गए और कार में बैठकर ग्राहकों की कतारें देखते रहे। यहीं से McDonald's के साथ उनकी कहानी शुरू हुई।
गर्बर दो बातों पर ज़ोर देते हैं, जो दिखाती हैं कि क्रॉक की असली प्रतिभा बर्गर बनाना नहीं, बल्कि "प्रणाली डिज़ाइन करना" थी। फ़्रेंच फ़्राइज़ बनाने में वे लगभग धार्मिक अनुष्ठान जैसी सख़्ती चाहते थे, यहाँ तक कि सप्लायरों के आलुओं में पानी की मात्रा जाँचने के लिए हाइड्रोमीटर के साथ लोग भेजते थे। प्रोटोटाइप दुकान में फ़्राइज़ वार्मर में सात मिनट से ज़्यादा नहीं रखे जा सकते थे ताकि नरम न पड़ें, और बर्गर ग्रिल से उतारने के बाद दस मिनट से ज़्यादा नहीं रखे जा सकते थे ताकि रसीले रहें। हर चरण पहले "प्रोटोटाइप दुकान" में परखा जाता, फिर दोहराने लायक और नियंत्रित मानक प्रक्रिया बनाया जाता।
गर्बर के अनुसार McDonald's असल में बर्गर नहीं, बल्कि "कारोबार करने की प्रणाली" बेचता है। कोई भी साधारण कर्मचारी मानक प्रक्रियाओं का पालन करके एक जैसे नतीजे दे सकता है।
उनका कहना है कि चाहे आप फ़्रैंचाइज़ करें या नहीं, हर मालिक को अपना व्यवसाय "भविष्य की हज़ार फ़्रैंचाइज़ दुकानों के प्रोटोटाइप" की तरह बनाना चाहिए। मुख्य सिद्धांत:
McDonald's के अलावा गर्बर उन ब्रांडों के नाम भी गिनाते हैं जो उनकी नज़र में "फ़्रैंचाइज़ प्रोटोटाइप" की भावना दिखाते हैं: FedEx, Disney World, Mrs. Fields कुकीज़, Subway, Domino's Pizza, KFC, Pizza Hut, Taco Bell, UPS और Universal Studios। उनका तर्क है कि ये कंपनियाँ हज़ारों जगहों तक फैलकर भी एक जैसी गुणवत्ता इसलिए बनाए रख पाईं क्योंकि उन्होंने "पहले एक दुकान को बेहतरीन प्रोटोटाइप बनाया, फिर प्रणाली की नक़ल की, लोगों की नहीं"।
प्रोटोटाइप दुकान "सपने का छोटा रूप" है: पूरा सपना पहले एक ही दुकान में साकार और परखा जाता है, और उसके बाद ही फ़्रैंचाइज़ी से कहा जाता है, "आइए, मैं दिखाता हूँ यह कैसे चलता है।" वे ज़ोर देकर कहते हैं: "प्रणाली व्यवसाय चलाती है। लोग प्रणाली चलाते हैं।" (The system runs the business. The people run the system.)
इसीलिए क्रॉक की बनाई व्यवस्था जान-बूझकर फ़्रैंचाइज़ी के "अपने फ़ैसले की गुंजाइश" को कम से कम रखती है। शुरू करने से पहले फ़्रैंचाइज़ी को कड़ा प्रशिक्षण पास करना होता है। अगर मुख्यालय ने व्यवसाय को अच्छी तरह डिज़ाइन किया है, तो हर समस्या पहले ही सोची और सुलझाई जा चुकी होती है, और फ़्रैंचाइज़ी को बस यह प्रणाली संभालना सीखना होता है, खुद से जुगाड़ करना नहीं।
गर्बर तीन लगातार चलने वाली प्रक्रियाएँ बताते हैं:
गर्बर व्यवसाय की प्रणाली बनाते समय क्रम से सोचने का एक ढाँचा देते हैं:
सबसे पहले तय करें कि आप अपनी ज़िंदगी कैसी चाहते हैं। यही पूरी योजना की शुरुआत है। लेखक ज़ोर देते हैं कि मुख्य लक्ष्य तय किए बिना आप यह नहीं आँक सकते कि व्यवसाय आपके जीवन के लक्ष्यों तक पहुँचने में मदद करेगा या नहीं।
मुख्य लक्ष्य को इस ठोस विवरण में बदलें कि "पूरा होने पर व्यवसाय कैसा दिखेगा" (जैसे आमदनी का आकार; पैमाना पैसा है)।
आपका विज़न कितना बड़ा है? जब वह आख़िरकार पूरा होगा, तो आपकी कंपनी कितनी बड़ी होगी? 3 लाख डॉलर के कारोबार वाली कंपनी? 10 लाख डॉलर की? या 50 करोड़ डॉलर की? अगर आपको जवाब नहीं पता, तो आप कैसे जानेंगे कि आपका व्यवसाय आपको मुख्य लक्ष्य तक पहुँचाएगा या नहीं?
रणनीतिक लक्ष्य के आधार पर आदर्श संगठन चार्ट और पद बनाएँ, मौजूदा कर्मचारियों की क्षमता के हिसाब से जोड़-तोड़ न करें।
अगर हर कोई सब कुछ करे, तो किसी भी चीज़ की ज़िम्मेदारी किसकी है? संगठन चार्ट के बिना सब कुछ क़िस्मत और अच्छी भावनाओं पर, लोगों के स्वभाव और उनकी आपसी सद्भावना पर टिका रहता है।
एक उदाहरण संगठन चार्ट में ये पद हो सकते हैं:
भले ही कंपनी में सिर्फ़ दो लोग हों, संगठन चार्ट के हर खाने में उन्हीं के नाम भरे जाने चाहिए; ये दोनों एक साथ शेयरधारक भी होंगे और कर्मचारी भी।
अगला कदम है चार्ट के हर पद के लिए पद अनुबंध (Position Contract) लिखना। इसमें उस पद से अपेक्षित नतीजों का सार, पदधारी की ज़िम्मेदारी वाले काम, नतीजों को आँकने के मानकों की सूची, और इन ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए सहमत व्यक्ति के हस्ताक्षर की जगह होती है।
एक प्रबंधन प्रणाली बनाएँ और उभरते हुए नए प्रबंधकों को उसका इस्तेमाल सिखाएँ, ताकि संगठन चार्ट के किसी भी पद पर बैठा व्यक्ति पूर्वानुमेय और दोहराए जा सकने वाले नतीजे दे। यही कदम तीसरे चरण में बनाए गए संगठन को सचमुच चलाता है।
सुनिश्चित करें कि टीम पिछले चरण में बनी प्रबंधन प्रणाली के अनुसार सचमुच काम करे। मुख्य बात है कर्मचारियों को प्रणाली का पालन करने के लिए भर्ती और प्रशिक्षित करना, न कि उनके निजी फ़ैसले या प्रतिभा पर भरोसा करना।
ग्राहक की "महसूस की गई ज़रूरतों" को समझें, और उनके आधार पर उन्हें पूरा करने वाला प्रोटोटाइप बनाएँ और परखें।
मार्केटिंग रणनीति बनाते समय आपको अपने सपने, अपना विज़न, अपनी रुचियाँ और अपनी चाहत भूलनी ही होगी। अपने ग्राहक के सिवा सब कुछ भूल जाइए!
एक मशहूर कहावत है: "ज़रूरत ढूँढो और उसे पूरा करो।" यह पूरी तरह सही नहीं है। होना चाहिए: "महसूस की गई ज़रूरत ढूँढो और उसे पूरा करो।" क्योंकि अगर ग्राहक को यह महसूस नहीं होता कि उसे किसी चीज़ की ज़रूरत है, तो उसे सचमुच उसकी ज़रूरत नहीं है, भले ही असल में हो।
यही धारणाएँ ग्राहक की निर्णय प्रक्रिया का केंद्र हैं। अगर आप उनका जनसांख्यिकीय विवरण जानते हैं, तो आप समझ सकते हैं कि ये धारणाएँ क्या हैं, और फिर पता लगा सकते हैं कि उन्हें और उनसे पैदा होने वाली उम्मीदों को पूरा करने के लिए क्या करना है।
हर ग्राहक प्रोफ़ाइल (Demographic Model) की कुछ ख़ास धारणाएँ होती हैं जिन्हें पहले से पहचाना जा सकता है। एक ख़ास उम्र, ख़ास शिक्षा स्तर, ख़ास परिवार के आकार वाली और किसी ख़ास इलाक़े में रहने वाली महिलाएँ बहुत ख़ास मनोवैज्ञानिक कारणों से ख़रीदारी करती हैं। ये अवचेतन कारण अलग उम्र, अलग वैवाहिक स्थिति, अलग शिक्षा वाली और देश के किसी दूसरे हिस्से में रहने वाली महिलाओं के समूह से अलग होंगे।
ऐसे दौर में जब ग्राहक इतने उत्पादों और वादों से घिरे हैं कि उलझन और दुविधा में पड़ जाते हैं, हमारे समय की चुनौती है ग्राहक की भाषा सीखना और उसे साफ़ और धाराप्रवाह बोलना, ताकि शोर के बीच आपकी आवाज़ सुनी जाए।
"ठीक-ठीक, मेरा ग्राहक कौन है? उसकी जनसांख्यिकीय प्रोफ़ाइल क्या है? जिन लोगों से आप अभी मिले ही नहीं, उन्हें कैसे ढूँढेंगे?"
पिछले छह चरणों से निकले सभी तरीक़ों को "हार्ड सिस्टम, सॉफ़्ट सिस्टम और सूचना सिस्टम" के रूप में दस्तावेज़ में दर्ज करें, ताकि ग्राहक से किया गया अनुभव का वादा सचमुच निभाया जा सके।
इनमें सॉफ़्ट सिस्टम का मतलब बिक्री प्रणाली है। यह आपके और ग्राहक के बीच सोच-समझकर रचा गया संवाद है, जो छह मुख्य चरणों पर चलता है:
E-Myth Worldwide में इसे "पावर पॉइंट बिक्री प्रणाली" कहा जाता है। उनके साथ काम करने वाली एक करियर डेवलपमेंट कंपनी ने इसे बिल्कुल अनुभवहीन लोगों को सौंपा, और एक साल में आमदनी 300% बढ़ गई।
पावर पॉइंट बिक्री प्रणाली का सबसे अहम हिस्सा पावर पॉइंट बिक्री प्रक्रिया है, जिसमें शामिल हैं:
गर्बर पाठकों से एक विचार-प्रयोग करने को कहते हैं: मान लीजिए आप जो दुकान अभी चला रहे हैं, वह आगे पाँच हज़ार शाखाओं का प्रोटोटाइप बनेगी। फिर खुद से तीन सवाल पूछिए:
वे साफ़ कहते हैं कि प्रोटोटाइप दुकान को यह मानकर डिज़ाइन करना चाहिए कि उसे "सबसे कम कौशल" वाले लोग चलाएँगे, क्योंकि अगर प्रणाली ऊँचे कौशल वाले लोगों पर निर्भर है, तो उसे दोहराया नहीं जा सकता; ऐसे लोग बाज़ार में दुर्लभ और महँगे हैं। यही "विशेषज्ञ पर निर्भर" (expert-dependent) की जगह "प्रणाली पर निर्भर" (systems-dependent) होने का ठोस रूप है।
उनका गंजा सिर चाँदनी में चमकता है, भटके यात्रियों के लिए प्रकाशस्तंभ की तरह।
उन्होंने जो भी किताब पढ़ी, वह इस सागर पर एक इमारत बन गई।
आगे और भी सागर-देवता आएँगे, अपनी-अपनी किताबें लेकर।
किताबों के सागर में 29 असली द्वीप हैं, हर विषय के लिए एक। द्वीप की हर इमारत एक किताब है।